गीता में कहा गया है – "उद्धरेदात्मनात्मानं..." (अपने मन को स्वयं ऊपर उठाएं)। इसका अर्थ है अपनी अंतर्वासनाओं को पहचानना और उन्हें नियंत्रित करना, न कि उनके गुलाम बनना।
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संतोषी कुंडली की नाट्य रचनाओं में ‘अन्तरवासन’ को ‘एकांत’ और ‘विच्छेद’ के रूप में दिखाया गया है। उनके नाटक ‘परिचय’ में मुख्य नायक का एकाकी मोनोलोग इस बात का प्रमाण है कि कैसे मनुष्य अपने अंदर के ‘वासन’ को पहचान कर, अपने जीवन को पुनः परिभाषित करता है। बिना किसी फिल्टर के।
सबसे पहले यह मानिए कि आपके भीतर इच्छाएं हैं। इच्छा रखना पाप नहीं है। यह मानव होने का प्रमाण है। एक डायरी में लिखिए कि आप वास्तव में क्या चाहते हैं? बिना किसी फिल्टर के। antervasna hindi